Monday, 29 June 2015

जानिए भारत-अमेरिका रिश्ते की कड़वी सच्‍चाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भले ही भारत-अमेरिका रिश्ते की नई बुनियाद रखी हो, मगर यह एक कड़वी सच्चाई है कि विज्ञान की दुनिया में अपना जबरदस्त योगदान देने वाले दोनों देशों के वैज्ञानिकों को वीजा के मामले में लालफीताशाही का शिकार होना पड़ रहा है। 

दोनों देशों के वैज्ञानिकों को या तो वीजा नहीं मिल पा रहा है या फिर जटिल प्रक्रियाओं से दो-चार होने के बाद काफी देरी से वीजा मिल पा रहा है।

इस साल गणतंत्र दिवस समारोह के मौके पर मोदी के साथ मुख्य अतिथि रहे राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ ‘चाय पे चर्चा’ करने के बावजूद वीजा संबंधी रुकावटें दोनों देशों के रिश्तों में अभी तक उतनी गर्मी नहीं आ पाई है। 

वीजा नियमों की जटिलताएं दुनिया की सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्रों के बीच वैज्ञानिक योगदानों के मुक्त आवागमन में बाधा पहुंचा रही है। भारत रत्न से सम्मानित और प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर सीएनआर राव ने भी अमेरिकी वीजा को जटिल और मुश्किलों वाला बताया था। ऐसा नहीं है कि वीजा हासिल करना सिर्फ एकतरफा ही रहा हो, भारत आने के लिए अमेरिकी वैज्ञानिकों को भी कुछ ऐसी ही मुश्किलों से दो-चार होना पड़ता है। 


तीन साल पहले ऐसी ही जटिलताओं की वजह से भारत आए भूकंप शोधकर्ता डॉ. रोजर बिल्हाम को भी वापस जाना पड़ा था। दोनों ही देशों में लालफीताशाही इतनी चरम पर है कि वैज्ञानिकों को समय पर वीजा हासिल करना एक टेढ़ी खीर बन चुका है।

सीएसआईआर के डीजी को भी नहीं मिल पाया वीजा
ज्यादातर वैज्ञानिक स्वाभाविक तौर पर वीजा जैसी पेचीदगियों में उलझना पसंद नहीं करते। इसके बजाय वह अपनी प्रयोगशालाओं में वक्त देना ज्यादा मुफीद समझते हैं। 

इसी हफ्ते भारत के प्रमुख पेट्रोलियम शोधकर्ता और वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के� महानिदेशक डॉ. एमओ गर्ग को कोलंबस (ओहायो) में होने वाले एक वैज्ञानिक सम्मेलन में शिरकत करने के लिए अमेरिकी वीजा नहीं मिल पाया था। जबकि गर्ग देश की इस सबसे बड़ी नागरिक प्रयोगशाला के प्रमुख हैं।

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